Sunday, April 18, 2010

समाजवाद की जड़

साम्यवाद तथा पूँजीवाद की हकीक़त -
इस बात पर पहले ही काफी प्रकाश डाला जा चुका है कि साम्यवादी सामान्यतया धनाढ्य होते है अथवा धनाढ्य परिवेश से साम्यवाद कि ओर आते हैं.साम्यवाद कि चचेरी बहन समाजवाद भी कभी कभी सिक्को के खनक से ही पैदा होती है .तथ्य के तौर पे ये महज एक संयोग नहीं है कि महान समाजवादी नेहरु एक धनाढय परिवार से है ,ये भी महज एक संयोग नहीं है कि वृंदा करात और नामवर सिंह जैसे साम्यवादी भी गरीबी की गलियों से नहीं आये.जो कुछेक अपने विगत दिनों को गरीबी के दिन बोलते हैं आश्चर्य नहीं कि उनमे से अधिकाँश अतिशयोक्ति होती है.सवाल ये उठता है कि इसका कारण क्या है ?तो इसका उत्तर हमे बेहतर मिलेगा अगर हम इनके चिर प्रतिद्वंदी पूंजीवादी सज्जनों की गलियों से गुजर कर खोजे .
यह भी महज एक संयोग नहीं है कि धीरुभाई अम्बानी जैसे न जाने कितने पूंजीवादी कि सतह से उठकर आये है फिर भी वे समाजवादी या साम्यवादी नहीं है अब निष्कर्ष रूप में सवाल कुछ यू उठता है कि जो खुद गरीबी की लहरों पे कश्तिया चलाकर पूँजीवाद के साहिल तक पहुंचे वे क्यों उन्ही गरीबो के हमदर्द नहीं है और जिन्होंने गरीबी को रशियन बायनाकुलर मात्र से देखा है वे उसके लिए ज्यादा फिक्रमंद है.
तो जवाब ये है जनाब कि जिसने गरीबी देखी है उसके लिए कष्ट उतने कष्टदायी नहीं होते जितने आलिशान घरो में रहने वाले लोगो के लिए कष्टों की कल्पना .कष्ट की तीव्रता कल्पना में वास्तिविकता से कही अधिक होती है यही वजह है की जब सिक्को में खेलने वालो का ध्यान गरीबी की तरफ जाता है तो वे उस कष्ट का अनुभव करते है जो पूंजीवादी अपने शुरूआती गुरबत के दिनों में नहीं कर पाते .नमूने के तौर पर बस ये समझ लीजिये कि ठंडी की रात में खेत से गुजरते हुए किसान को उतनी ठण्ड नहीं लगती लेकिन मखमली रजाई में बैठा कोई भी शख्श ऐसा ऐसा सोच के ही काप जाता है ….
यही है समाजवाद तथा पूँजीवाद की हकीक़त ……………….
-धनञ्जय मिश्र ”विप्र”
साहित्यिक सचिव
अमरनाथ झा छात्रावास
इलाहाबाद विश्वविद्यालय